CHAPTER 2 – काँच सा एहसास
सुबह की हल्की ठंडी हवा कमरे में फैल रही थी, लेकिन अलीज़ा की नींद इतने कोमल झोंकों से शायद ही कभी टूटी थी। आज उसके दिल में एक अजीब-सी बेचैनी थी—जैसे कोई अनजाना डर उसके आस-पास मंडरा रहा हो।
आँखें खुलीं तो सामने शीशे में उसकी धुँधली-सी परछाईं दिखाई दी। चेहरा हमेशा की तरह खूबसूरत था, लेकिन आज उसमें थकान और उदासी साफ झलक रही थी—मानो वह रातभर किसी अनदेखी लड़ाई में उलझी रही हो।
अलीज़ा बचपन से ही खामोश, नरम दिल और सबकी लाडली थी। वह सबकी खुशियाँ समेट लेती थी, लेकिन अपने दिल की बात हमेशा खुद से ही कहती थी।
नीचे से अम्मी की आवाज़ आई—
“अलीज़ा! नाश्ता ठंडा हो रहा है, जल्दी आ जाओ।”
वह हल्का सा मुस्कराई। उसकी मुस्कान में मिठास भी थी और छुपा हुआ दर्द भी। लोग अक्सर उसकी मुस्कान देखकर सोचते कि वह बहुत खुश है, लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह मुस्कान भी काँच की तरह नाज़ुक है—हल्का सा भी झटका लगे तो टूट जाती है।
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घर का माहौल
नीचे आकर उसने देखा कि सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं।
अम्मी किचन में, अब्बू अख़बार के साथ, और नादिया अपनी किताबें समेट रही थी।
सब कुछ बिल्कुल सामान्य था…
बस अलीज़ा का दिल सामान्य नहीं था।
वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।
अम्मी ने पूछा—
“क्या हुआ बेटा? तबियत ठीक नहीं लग रही?”
वह हमेशा की तरह मुस्कराई,
“नहीं अम्मी, मैं ठीक हूँ।”
लेकिन उसकी आँखों की थकान मुस्कान को झूठा साबित कर रही थी।
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बीती यादों का दर्द
खाने में उसका बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था।
पिछले कुछ दिनों से उसे लगता था कि जिंदगी उसे किसी ऐसे मोड़ पर ले आई है जहाँ आगे का रास्ता धुँधला हो गया है।
उसे याद आया वो दिन…
जब किसी खास एहसास ने उसके दिल में जगह बनाई थी।
एक ऐसा एहसास—जो धूप की तरह गर्म भी था और शाम की तरह ठंडा भी।
लेकिन वो एहसास अचानक
काँच की तरह टूट गया था।
अलीज़ा की आँखें नम हो गईं,
पर उसने किसी को दिखने नहीं दिया।
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उसकी ख़ामोशी
घर में किसी को अंदाज़ा नहीं था कि
अलीज़ा बाहर से जितनी मजबूत दिखाई देती है,
अंदर से उतनी ही टूटने वाली है।
वह हर दर्द, हर बात खुद में समेट लेती थी।
आज भी वह कुछ कहना चाहती थी…
लेकिन उसकी ज़ुबान खामोश थी।
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अम्मी की नज़र
अम्मी फिर उसके पास आईं,
“बेटा, अगर दिल में कोई बात है, तो मुझे बता सकती हो।”
अलीज़ा ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में चमक भी थी और दर्द भी।
“नहीं अम्मी… बस नींद पूरी नहीं हुई।”
यह आधा सच था—पूरा नहीं।
अम्मी ने ज़ोर नहीं दिया और वापस चली गईं।
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छोटी डायरी
कमरे में आकर उसने अपनी पुरानी अलमारी से वह छोटी डायरी निकाली जिसकी स्याही में उसकी सारी अनकही बातें छुपी थीं।
उसने पहला पन्ना खोला।
वहाँ लिखा था—
“कुछ एहसास इतने नाज़ुक होते हैं कि
उन्हें छू लो, तो टूट जाते हैं।
और कभी-कभी हम समझ ही नहीं पाते कि
कौन-सा एहसास संजोना है
और कौन-सा छोड़ देना है।”
डायरी बंद करते समय उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
आज शायद किसी पुराने ज़ख्म ने फिर से दर्द जगाया था।
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